वैकुण्ठ चतुर्दशी हरिहर स्तवन हिन्दी अर्थ सहित

Vaikunth Chaturdashi 2026: श्रीहरिहर स्तवन हिन्दी अर्थ सहित, पूजा विधि, कथा और दिव्य लाभ

📖 Introduction (परिचय): Harihar Stavan with Hindi Meaning

कार्तिक मास की शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाने वाली वैकुण्ठ चतुर्दशी ( vaikunth chaturdashi 2026 )हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और दिव्य पर्व है। इस दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव की संयुक्त आराधना की जाती है, जिसे हरिहर मिलन दिवस भी कहा जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने काशी में भगवान शिव की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया था, जिससे यह तिथि अत्यंत पुण्यदायी बन गई।

इस विशेष अवसर पर श्रीहरिहर स्तवन का पाठ करने से भक्त को शिव और विष्णु दोनों की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सुख, शांति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इस लेख में हम आपको वैकुण्ठ चतुर्दशी की कथा, पूजा विधि, महत्व और हरिहर स्तवन हिन्दी अर्थ सहित विस्तार से बताएंगे।

वैकुंठ चतुर्दशी (vaikunth chaturdashi 2026) पर भगवान नारायण और शंकर नारायण की सम्मिलित स्तुति

कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को वैकुंठ चतुर्दशी, जिसे हरिहर मिलन दिवस, हरिवैकुण्ठ महोत्सव या हरिहर एकादश-चतुर्दशी संगम भी कहा जाता है। इस दिन भगवान नारायण और भगवान शिव की संयुक्त आराधना की जाती है।

👉🍁तिथि व विशेषता : कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को यह पावन पर्व मनाया जाता है — ठीक देव दीपावली से एक दिन पूर्व। यह वह दिन है जब भगवान शिव और भगवान विष्णु का दिव्य मिलन हुआ था — अतः इसे हरिहर-संयोग तिथि भी कहते हैं।

पौराणिक कथा : एक बार भगवान विष्णु काशी (वाराणसी) आए। वहाँ उन्होंने भगवान विश्वेश्वर महादेव की आराधना की और एक हजार स्वर्ण कमलों से पूजा की। जब भगवान विष्णु ने कमल पुष्प अर्पित करने आरंभ किए, तो उन्हें लगा कि एक पुष्प कम है। उन्होंने अपने हृदय में स्थित कमल समान नेत्र (श्री विष्णु के चतुर्थ कमल – चक्र नेत्र) को तोड़कर अर्पण करना चाहा। यह देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले — “हे विष्णो! तुमने अपनी करुणा और भक्ति से मेरा हृदय जीत लिया है। आज से यह तिथि — जब भक्त अपने हृदय का कमल अर्पण करे — वैकुण्ठ चतुर्दशी कहलाएगी।” तभी भगवान शिव ने विष्णु को वर दिया — “जो इस दिन मेरी आराधना विष्णु के साथ करेगा, उसे वैकुण्ठलोक की प्राप्ति होगी।”

👉🍁धार्मिक महत्व : इस दिन शिव और विष्णु दोनों की संयुक्त उपासना करने से भक्त को 👉 शिवलोक, 👉 विष्णुलोक (वैकुण्ठ), 👉 और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसीलिए इसे “हरिहर मिलन दिवस” कहा गया।

👉🍁पूजा-विधि : vaikunth chaturdashi 2026

प्रातःकाल :

  1. स्नान के बाद “ॐ नमो नारायणाय” और “ॐ नमः शिवाय” मंत्रों का जप करें।
  2. भगवान विष्णु को तुलसीदल, पीत वस्त्र, पीत पुष्प चढ़ाएँ।
  3. भगवान शिव को बिल्वपत्र, दूध, धतूरा, गंगाजल अर्पित करें।

मध्याह्न :
श्रीहरि को एक सहस्र कमलों से पूजना शुभ माना गया है (यदि संभव न हो तो “एक कमल” ही श्रद्धापूर्वक चढ़ाएँ)।
“हरिहर संयुक्त दीपदान” — एक दीपक भगवान विष्णु के समक्ष, एक भगवान शिव के समक्ष जलाएँ।
“ॐ नमो हरिहराय नमः” का 108 बार जप करें।

रात्रि :
हरि-शंकर कथा, विष्णु सहस्रनाम, रुद्राभिषेक, या शिव-विष्णु संयुक्त स्तोत्र का पाठ करें।
काशी या अपने घर में दीपदान करें — इसे वैकुण्ठ दीपदान कहा जाता है।

विशेष लाभ :

साधनाफल
शिव-विष्णु संयुक्त पूजाद्विगुण पुण्य एवं मोक्षप्राप्ति
दीपदानपितृ ऋण शमन, संतान सौख्य
तुलसी और बिल्वपत्र अर्पणरोग, भय, दोष निवारण
व्रत एवं उपवासवैकुण्ठगमन समान फल

🌷🌷हरिहर स्तवन हिन्दी अर्थ सहित ( Harihar Stavan with Hindi Meaning ) 🌷🌷

॥ मंगलाचरणम् ॥

हरिहर संयुक्त मंत्र :

ॐ हरिहराय नमः।
ॐ नमो हरिहराय नमः।
ॐ नमो हरिहरायैकात्मने नमः।

श्लोक

हरिर्हरश्चैकतनू विभातौ, शिवो विष्णुश्चैव न भिद्यते कः।
यं भजति भक्तः समदर्शनैक्यं, स वैकुण्ठं याति निरामयात्मा॥

(अर्थ — हरि और हर एक ही तत्व हैं। जो इस संयुक्त रूप की भक्ति करता है, वह वैकुण्ठ की अमर अवस्था को प्राप्त होता है।)


🍁 ॐ नमो हरिहरायैक्यरूपाय धीमते ।
विश्वनारायणायैव परमात्मने नमः ॥१

अर्थ: मैं उस हरिहर एकरूप परमात्मा को प्रणाम करता हूँ — जो विष्णु रूप में विश्व का पालन करते हैं और शिव रूप में उसका संहार कर पुनः सृजन करते हैं।

🍁 शिवो विष्णुः शिवो विष्णुः, इत्येकं तत्त्वमव्ययम्।
भिद्यते न कदाचित् तदेकं ब्रह्म सनातनम्॥२

अर्थ: शिव और विष्णु भिन्न नहीं हैं — दोनों एक ही सनातन ब्रह्म हैं, जो कभी विभक्त नहीं होते।

🍁 वैकुण्ठे यः सदा विष्णुः, काश्यां तु विश्वेश्वरः शिवः।
एको देवो द्विधा जातः, भक्तानां मंगलाय च॥३

अर्थ: जो विष्णु वैकुण्ठ में विराजते हैं, वही शिव काशी में विश्वेश्वर रूप में हैं; दोनों भक्तों के मंगल हेतु प्रकट हुए हैं।


॥ हरिहर ऐक्य महिमा ॥

🍁 हरिर्यदि न भवेत् तत्र, न स्याद्भक्तिर्न पावनम्।
हरश्चेद्विष्णुरूपो न, न स्यान्मोक्षः कदाचन॥४

अर्थ: यदि हरि न हों तो भक्ति अधूरी है, और यदि हर रूप में विष्णु न हों तो मोक्ष असंभव है।

🍁 विष्णोः प्रसादात् शिवो भूत्वा, जगत्पाति शिवार्चनः।
शिवस्य कृपया विष्णुश्च, सर्वं संसारमुद्धरेत्॥५

अर्थ: विष्णु की कृपा से शिव सृष्टि की रक्षा करते हैं और शिव की कृपा से विष्णु जगत को उद्धार देते हैं।

🍁 हरिश्च हरिरूपेण, हरिश्च हरिमेव हि।
यो भजत्येकभावेन, स याति परमं पदम्॥६

अर्थ: जो साधक हरि और हर को एक भाव से भजता है, वही परम पद — वैकुण्ठ को प्राप्त करता है।

🍁 त्रिपुरारिर्नारायणः साक्षात्, साक्षादेकं महोदयम्।
यो ज्ञात्वा नान्यदेवान् च, पूजयेत्स फलप्रदः॥७

अर्थ: त्रिपुरारी ही नारायण हैं — जो इस सत्य को जानकर केवल हरिहर को पूजता है, वही सिद्धि और फल प्राप्त करता है।

🍁 नारायणोऽपि संहारं, कृत्वा लीलामहेश्वरः।
एक एव स्वयंज्योतिः, विभाति ब्रह्मरूपतः॥८

अर्थ: जब विष्णु संहार करते हैं तो वह महेश्वर बन जाते हैं; वास्तव में दोनों एक ही ज्योतिस्वरूप ब्रह्म हैं।

🍁 विष्णुश्च शिवरूपश्च, शिवो विष्णुरसंशयम्।
द्वौ रूपौ प्रेमभाजन्यौ, भक्तानां रक्षणाय च॥९

अर्थ: विष्णु और शिव — दोनों प्रेम के स्वरूप हैं और भक्तों की रक्षा के लिए भिन्न रूप धारण करते हैं।


॥ वैकुण्ठ-काशी ऐक्य ॥

🍁 काश्यां स्थितं विश्वनाथं, वैकुण्ठे श्रीहरिं तथा।
उभौ नित्यं हृदि ध्यायेत्, स योगी मुक्तिमाप्नुयात्॥१०

अर्थ: जो योगी अपने हृदय में काशी के विश्वनाथ और वैकुण्ठ के हरि — दोनों का ध्यान करता है, वह मुक्त होता है।

🍁 तुलसीदलविल्वेन, युग्मं पूजयते नरः।
स तिष्ठति हरौ लोके, शिवलोकसमन्विते॥११

अर्थ: जो भक्त तुलसी और बिल्वपत्र से हरि-हर की पूजा करता है, वह हरि-शिव संयुक्त लोक में वास करता है।

🍁 यत्र गंगा सरस्वत्योः संगमं पुण्यमुत्तमम्।
तत्र हरिहरौ नित्यं, वसतः भक्तरक्षणे॥१२

अर्थ: जहाँ गंगा और सरस्वती मिलती हैं, वहाँ हरि-हर सदा भक्तों की रक्षा हेतु वास करते हैं।

🍁 काशी वैकुण्ठमित्येकं, रूपं दिव्यं सनातनम्।
ज्ञानदीपं प्रज्वलय्य, जीवो ब्रह्मसमो भवेत्॥१३

अर्थ: काशी और वैकुण्ठ वास्तव में एक ही दिव्य लोक हैं; जो वहाँ के हरिहर का ध्यान करता है, वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।

🍁 हरिश्चतुर्दशी प्राप्य, यः स्नायाद्गङ्गया जलम्।
वैकुण्ठं स गतो नूनं, न संशयोऽत्र विद्यते॥१४

अर्थ: जो वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन गंगाजल से स्नान करता है, वह निश्चित रूप से वैकुण्ठ को प्राप्त करता है।

🍁 हरिदीपं शिवाय दद्याद्, शिवदीपं हराय च।
एवं दीपसमाराध्यं, सर्वपापप्रणाशनम्॥१५

अर्थ: यदि कोई हरि को शिवदीप और शिव को हरिदीप अर्पित करे — तो वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।


॥ भक्ति, दीपदान और एकत्व प्रार्थना ॥

🍁 दीपज्योतिः परं ब्रह्म, हरिहरैकसंस्थितम्।
यः पश्यति तदा भक्त्या, तस्य चित्तं विशुद्ध्यति॥१६

अर्थ: दीप की ज्योति ही हरि-हर का संयुक्त ब्रह्म है; जो भक्त भाव से उसे देखता है, उसका चित्त निर्मल होता है।

🍁 हरिर्हि हृदये शम्भुः, शम्भुर्हृदि जनार्दनः।
यो वेत्ति सर्वमेकत्वं, स याति परमं सुखम्॥१७

अर्थ: शिव हृदय में हरि हैं और हरि के हृदय में शिव — जो इस सत्य को जानता है, वह परम आनंद को प्राप्त करता है।

🍁 नारायणं महादेवं, नमामि प्रेमपूर्वकम्।
ययोः कृपया संसारो, भवसिन्धोः परं तरेत्॥१८

अर्थ: मैं नारायण और महादेव — दोनों को प्रेमपूर्वक नमस्कार करता हूँ; जिनकी कृपा से जीव संसारसागर से पार होता है।

🍁 न हि भेदोऽस्ति देवेषु, शिवविष्ण्वादिषु क्वचित्।
भक्त्यैक्यं तत्र साध्यं, नान्यथा मोक्षसिद्धये॥१९

अर्थ: देवताओं में कोई भेद नहीं है — केवल भक्तिभाव का ऐक्य ही मोक्ष की प्राप्ति का साधन है।

🍁 हरिर्हरं समालभ्य, भक्तो दीपं समर्पयेत्।
एषा वैकुण्ठचतुर्दश्याः, परमं रहस्यमुच्यते॥२०

अर्थ: जो भक्त इस दिन हरि-हर का ध्यान करके दीप अर्पित करता है, वह इस पर्व का परम रहस्य जान लेता है।

🍁 एकदा वैकुण्ठनिकेतने श्रीहरिः शंकरं ययौ।
प्रणम्य प्रेमभक्त्या तं, पूजयामास भावतः॥२१

अर्थ: एक बार श्रीहरि स्वयं वैकुण्ठ से निकलकर कैलास गए और वहाँ भगवान शंकर को प्रेमपूर्वक प्रणाम कर उनकी आराधना की।

🍁 ततोऽभवदनुग्रहः, शूलपाणेरनुत्तमः।
“हरिर्मे हृदये तिष्ठतु” इति वाक्यं जगद्गुरोः॥२२

अर्थ: महादेव प्रसन्न होकर बोले — “हरि सदा मेरे हृदय में निवास करें।” यह ब्रह्मवाक्य सम्पूर्ण जगत के कल्याण हेतु हुआ।

🍁 अथ शंभोर्नृसिंहार्ते, हरिः प्रकटितो विभुः।
शिवोऽपि नटराजाख्यः, तं प्रणम्यावतारवान्॥२३

अर्थ: जब हिरण्यकशिपु का संहार करने को नृसिंह रूप प्रकट हुआ, तब स्वयं शिव नटराज बनकर उस अद्भुत अवतार को प्रणम्य हुए।

🍁 तयोरेव कृपायोगात्, सृष्टिः स्थितिः प्रणश्यति।
शिवः सृष्टौ जनार्दनः, संहारेऽपि हरिर्हरः॥२४

अर्थ: शिव और विष्णु की पारस्परिक शक्ति से ही सृष्टि, पालन और संहार होते हैं — एक दूसरे में नित्य समाहित।

🍁 वेदवेद्यौ द्विजप्रियौ, जगन्नाथौ सनातनौ।
भक्तानां प्रतिपालार्थं, द्विरूपं धारयन्ति हि॥२५

अर्थ: जो वेदस्वरूप और द्विजप्रिय हैं, वही हरि-हर भक्तों की रक्षा हेतु द्विरूप धारण करते हैं।


॥ योगान्तरैक्य रहस्य ॥

🍁 मूलाधारे हरिर्देवी, सहस्रारे महेश्वरः।
मध्यस्था योगिनी शक्तिः, तयोरेकत्वबोधिनी॥२६

अर्थ: मूलाधार में हरि की शक्ति स्थित है और सहस्रार में महेश्वर की; बीच में स्थित योगिनी शक्ति उनके ऐक्य का सेतु है।

🍁 प्राणायामे विष्णुरूपं, रेचके च महेश्वरम्।
पूरके जगदीशं तं, ध्यानं यः कुरुते बुधः॥२७

अर्थ: योग में श्वास लेते समय विष्णु का, छोड़ते समय शिव का, और धारण करते समय जगदीश्वर का ध्यान किया जाए।

🍁 हरिहरस्मरणं नित्यं, ध्यानं योगसमाश्रितम्।
संसारजालविनाशाय, मोक्षदं परमं पदम्॥२८

अर्थ: हरि-हर का नित्य स्मरण योगमार्ग में करने से संसार के बंधन नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

🍁 शिवाय विष्णुरूपाय, विष्णवे शंकरात्मने।
नमोऽस्तु भक्तवत्सल्य, दयासिन्धो नमो नमः॥२९

अर्थ: विष्णु जो शिवरूप हैं, और शिव जो विष्णुरूप हैं — उन दयामय भक्तवत्सल परमात्मा को नमस्कार है।

🍁 नानातत्त्वानि दृश्यन्ते, नामरूपविकल्पितम्।
एकमेव परं तत्त्वं, हरिहरैकसंस्थितम्॥३०

अर्थ: नाम और रूप अनेक हैं, परंतु सत्य केवल एक है — हरि और हर का एकत्व तत्त्व।


॥ दीपदान-महिमा ॥

🍁 यः प्रदीपं हरौ दद्यात्, शिवायापि समर्पयेत्।
तस्य जन्मशतं पुण्यं, कल्पकोटिफलं भवेत्॥३१

अर्थ: जो भक्त एक दीपक हरि और शिव दोनों को समर्पित करता है, उसे शतजन्मों का पुण्य और कल्पों का फल प्राप्त होता है।

🍁 तुलसीदलं बिल्वपत्रं, संयुतं यः निवेदयेत्।
स सर्वपापविनिर्मुक्तो, यान्ति वैकुण्ठमुत्तमम्॥३२

अर्थ: जो भक्त तुलसी और बिल्वपत्र एक साथ अर्पित करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ को प्राप्त होता है।

🍁 नारायणं महादेवं, संयुतं दीपमर्पयेत्।
स पश्यति परां मुक्तिं, देहान्ते नात्र संशयः॥३३

अर्थ: जो हरि-शंकर को संयुक्त दीप अर्पण करता है, वह शरीरांत में परम मुक्ति को प्राप्त करता है।

🍁 कैलासवैकुण्ठयोः मध्ये, ज्योतिः स्थिरं विभाव्यते।
तद्रूपं हरिहरयोः, योगिनां दृग्गोचरं भवेत्॥३४

अर्थ: कैलास और वैकुण्ठ के मध्य एक दिव्य ज्योति है — वही हरिहर का वास्तविक स्वरूप है, जो केवल योगियों को दृष्टिगोचर होता है।

🍁 दीपार्चना हरिशम्भोः, मोक्षमार्गस्य साधनम्।
यत्र दीपो ज्वलत्येष, तत्र भक्तिर्विराजते॥३५

अर्थ: हरि-शंकर की दीपार्चना ही मोक्ष का साधन है — जहाँ दीप जले, वहाँ भक्ति स्वयं प्रकट होती है।


॥ हरिहर एकात्म्य ज्ञान ॥

🍁 नारायणो महेशश्च, सर्वदैवैककारणम्।
सृष्टिस्थितिलयैकत्वं, बिभ्रतो नान्यथाभवेत्॥३६

अर्थ: नारायण और महेश ही इस सृष्टि के एकमात्र कारण हैं — वे सृष्टि, स्थिति और लय तीनों में अभिन्न हैं।

🍁 विष्णोः शिरसि गङ्गा च, शम्भोर्मूर्ध्नि तुलसी तथा।
एते संयुक्तरूपेण, धारयन्ति जगत्परम्॥३७

अर्थ: गंगा शिव के मस्तक पर और तुलसी विष्णु के सिर पर — दोनों का संगम जगत को पवित्र रखता है।

🍁 हरिर्नारायणः शान्तः, शिवः क्रोधोऽपि सुस्थितः।
युगपत्स्थितयोः तस्मात्, ब्रह्मैकत्वं निरामयम्॥३८

अर्थ: हरि शान्त स्वरूप हैं, शिव तामस रूप; दोनों का संतुलन ही शुद्ध ब्रह्म का ऐक्य है।

🍁 हरिणा विना शम्भुर्न, शम्भुना विना हरिः।
यत्रैकत्वं न दृश्येत्, तत्र धर्मो न वर्धते॥३९

अर्थ: हरि के बिना शिव नहीं, और शिव के बिना हरि नहीं — जहाँ उनका ऐक्य न हो, वहाँ धर्म का क्षय होता है।

🍁 विष्णोः कृपां विना शम्भोः, न स्यात्सिद्धिर्न मोक्षता।
शम्भोः प्रसादं विना विष्णोः, न स्यात्सत्त्वं न निर्भयम्॥४०

अर्थ: विष्णु की कृपा के बिना शिव की सिद्धि नहीं, और शिव की कृपा के बिना विष्णु का सत्व स्थिर नहीं — दोनों परस्पर आश्रित हैं।


॥ वैकुण्ठचतुर्दशी फलश्रुति ॥

🍁 वैकुण्ठचतुर्दश्यां तु, यः पठेद्देवसंनिधौ।
हरिहरैकभावेन, स याति परमं पदम्॥४१

अर्थ: जो व्यक्ति वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन हरिहर के समक्ष इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह परमपद को प्राप्त होता है।

🍁 यः श्रावयेत्समाहित्य, भक्तानां मध्ये भावतः।
स पापान् नाशयेत्सर्वान्, यथाग्निर्दारुकान्यथ॥४२

अर्थ: जो इसे भक्ति-भाव से दूसरों को सुनाता है, वह अपने और श्रोताओं के सभी पापों को भस्म कर देता है।

🍁 अशक्तो यदि पठ्येत, नाममात्रं स्मरेन्नरः।
तस्मै हरिहरौ दद्यात्, आयुः आरोग्यसम्पदः॥४३

अर्थ: जो व्यक्ति पाठ न कर सके, केवल स्मरण करे, उसे हरिहर दीर्घायु, आरोग्य और संपत्ति प्रदान करते हैं।

🍁 तुलसीवनबिल्वान्ते, दीपदानं विशेषतः।
करिष्यति यदि भक्तः, स विष्णुलोकमाप्नुयात्॥४४

अर्थ: जो भक्त तुलसी या बिल्ववृक्ष के पास दीपदान करता है, वह विष्णुलोक की प्राप्ति करता है।

🍁 काश्यां वा वैकुण्ठे वा, यत्र हरिहरौ स्थितौ।
तत्र स्नानं जपं दानं, सर्वपापप्रणाशनम्॥४५

अर्थ: काशी या वैकुण्ठ — जहाँ हरिहर निवास करते हैं — वहाँ स्नान, जप या दान करने से सभी पाप नष्ट होते हैं।

🍁 यत्र हरिश्च हरिश्चैव, संयुक्तौ भक्तरक्षणे।
तत्र वैकुण्ठमित्याहु:, योगिनां ध्यानगोचरम्॥४६

अर्थ: जहाँ हरि और हर भक्तों की रक्षा हेतु संयुक्त हों, वही स्थान वैकुण्ठ कहलाता है — जिसे योगी ध्यान में देखते हैं।

🍁 शिवो विष्णुर्नारायणोऽहमेकः, इति ज्ञानं परमं वदन्ति।
यो वेत्ति तत्त्वं हरिहरस्वरूपं, स याति शान्तिं परमां परस्य॥४७

अर्थ: जो जानता है कि “मैं ही हरि और शिव का एकत्व स्वरूप हूँ”, वही परमशान्ति को प्राप्त होता है।

🍁 भक्तो यः शरणं याति, हरिहरचरणद्वये।
तं संसारो न स्पृशति, स मुक्तः पुरुषोत्तमः॥४८

अर्थ: जो भक्त हरि-हर के चरणों में शरण लेता है, उसे संसार कभी बाँध नहीं सकता; वह पुरुषोत्तम स्वरूप हो जाता है।

🍁 हरिदर्शनमात्रेण, शम्भुदर्शनमाप्यते।
शम्भोर्दर्शनमात्रेण, हरिदर्शनमेव च॥४९

अर्थ: जो हरि का दर्शन करता है, वह शिव को देखता है, और जो शिव का दर्शन करता है, वह हरि को — दोनों दर्शन एक ही हैं।

🍁 अन्ते स्मृत्यैव यः कश्चित्, हरिहरं संप्रधारयेत्।
स देहत्यागे मुक्तोऽसौ, परं ब्रह्माधिगच्छति॥५०

अर्थ: जो मरते समय हरि-हर के ऐक्य का स्मरण करता है, वह शरीर त्यागकर परम ब्रह्म को प्राप्त होता है।

🍁 यः श्रद्धया पठति नित्यं हरिहरस्तवनं नरः ।
स लभेतां शिवं विष्णुं कृपां तयोर्न संशयः ॥

अर्थ: जो मनुष्य श्रद्धा से प्रतिदिन इस हरिहर स्तवन का पाठ करता है, वह निश्चय ही भगवान शिव और विष्णु — दोनों की कृपा प्राप्त करता है।


॥ इति श्री हरिहर स्तवन संपूर्णम् ॥

🔚 निष्कर्ष (Conclusion): Vaikunth Chaturdashi 2026

वैकुण्ठ चतुर्दशी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि हरि और हर के अद्वैत स्वरूप का अनुभव करने का अवसर है। यह हमें सिखाता है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु में कोई भेद नहीं है — दोनों एक ही परम सत्य के दो रूप हैं।

जो भक्त इस दिन श्रद्धा, भक्ति और शुद्ध हृदय से हरिहर की पूजा और स्तवन करता है, उसे न केवल सांसारिक सुख मिलते हैं, बल्कि अंततः मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होता है।

इसलिए इस पावन अवसर पर हरिहर स्तवन का पाठ, दीपदान और संयुक्त पूजा अवश्य करें — यही जीवन को दिव्यता और शांति की ओर ले जाने का सरल मार्ग है।

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